हिन्दी सेमिनार
Saturday, June 23, 2007
Wednesday, June 06, 2007
Thursday, May 31, 2007
Sunday, May 06, 2007
प्रशिक्षण कालीन शिविर
प्रशिक्षण कालीन शिविर
ZIET ग्वालियर
प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक हिन्दी
24-04-2007 से 04-06-2007
Friday, May 20, 2005
जगदीश मोहन रावत की कविताएँ
छन्द
कारे कजरारे नैना सरस सजीले अंग
अधर गुलाबी और चढ़ती जवानी है
साँवरी सलोनी बाँकी सखी बरसानेवारी
प्रेमरस भीगी नहीं देह में समानी है
झुकि झुकि झूमि झूमि झाँक रही कुंजन में
गौरस है संग और प्रेम भरी वानी है
बाँसुरी कौ चूनरी में ढाँपि ढाँपि पाँव धरै
यही घनस्याम तेरी प्रीति की निसानी है।
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गा रही मधुर गीत कनक छरी—सी प्रिया
यमुना के तीर, पीर मन की सुनाती है
बाँसुरी चुराय प्रीति तोही सौं लगाय स्याम
ठगी ठगी ठाड़ी तेरी प्रेयसी सयानी है
चूम चूम लेती तेरी बाँसुरी कौ बार बार
करि परिहास निज मन इठलानी है
अरुन कपोल भए, लाज लगी नाम लेत
यही घनस्याम तेरी प्रीति की निसानी है।
-जगदीश मोहन रावत
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दो गीत
तुम नवल संगीत की नव चेतना हो
तुम नवल संगीत की नव चेतना हो
नव चेतना का तुम नवल संगीत हो
नवल युग के गीत का तुम प्राण हो
नवल युग के प्राण का तुम गीत हो।
कनक घट अमृत भरा हो सरस पावन
तुम अविकसित पुष्प हरसिंगार हो
मदिर साँसों से प्रकृति होती सुगन्धित
निठुर जग में सार तुम ही प्यार हो
कर रहा मुझको प्रताणित जगत सारा
तुम्ही मेरी प्रेयसी हो तुम्ही मेरी मीत हो।
नवल युग के ..............................।।
स्वेदकण से चन्द्रमा के दाग धोती
हिम बदन कम कर रहा ज्वाला किरण की
तारिकाओं में तुम्हारा रूप शोभित
तुम्ही से झिलमिल मधुर पाटल सुमन की
कर रहे सुरभित गगन को केश बिखरे
मधुप के उर में तुम्हीं मधु प्रीति हो ।
नवल युग के ..........................।।
रजत स्वप्नों का मधुर सन्देश हो तुम
झिलमिलाती निशा के तुम रूप का उन्माद हो
पूर्णिमा के चाँद का शीतल सुगन्धित रूप हो
यक्ष विरही के ह्रदय में तुम प्रिया की याद हो
प्रीति के जल से भरा हो जलद कोमल
लाज का मोती लिये तुम एक सुन्दर सीप हो।
नवल युग के ...................................।।
-जगदीश मोहन रावत
आज मैंने चाँद देखा है उतरता
आज मैंने चाँद देखा है उतरता
कर रहा अठखेलियाँ निष्ठुर धरा पर
रश्मियाँ बिखरी हुईं चहुँ ओर हैं
रंग गए सब उँगलियों के पोर हैं
वेदना की आज ज्वाला हिम बनी है
मदिरालय पर थिरकते सब मोर हैं
आज संध्या गीत बनकर नाचती है
रजत पट सा झूमता है आज सागर।
कर रहा ...............................।।
रूप कोमल है मधुर श्रृंगार है
लाज से कम्पित अधर का प्यार है
उलझती आँखें सुनहले कुन्तलों में
मदिर यौवन का सरस उपहार है
झूमती है आज वसुधा गोद में ले
चाँद को, नभ का मधुर संदेश पाकर।
कर रहा ...............................।।
हर कली ने भ्रमर का संदेश पाया
कमल दल पर ओस ने मोती सजाया
बाँह के बंधन बँधी शेफालिनी है
अलस पलकों पर गुलाबी रंग आया
आज अलि पागल हुआ है अधर पीकर
इन्द्रधनुषी छटा फैली है धरा पर
कर रहा ...............................।।
मधुर स्वर में नवल वीणा बोलती है
हर श्रवण में बाँसुरी रस घोलती है
नूपुरों वाली मृदुल झंकार पावन
अनगिनत बंधन ह्रदय के खोलती है
आज सिन्दूरी हुए सपने सलोने
आज पावस जग उठी है कसमसाकर।
कर रहा ...............................।।
आज प्रियतम की मधुर मनुहार करले
आज यौवन अरुण को सुकुमार करले
प्रणय के स्वर में सजा ले गीत अपने
आज मादक मधु कलश स्वीकार करले
मस्त होकर झूम ले तू भी नशे में
आज हर अपमान सह ले मुस्कराकर।
कर रहा ...............................।।
-जगदीश मोहन रावत
सहायक आयुक्त
केन्द्रीय विद्यालय संगठन
देहरादून संभाग



